Wednesday, April 9, 2008

इस हाथ ले, उस हाथ दे

आज का टाइम्स ऑफ़ इंडिया पलट रहा था तो अचानक एक विज्ञापन पर नजर चली गयी. आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने राज्य में गरीबी रेखा से नीचे जी रहे लोगों को २ रूपये किलो चावल मुहैय्या कराने जा रहे हैं.बड़ी खुशी की बात है. पर एक चौथाई से भी ज्यादा के पन्ने पर, एक अखबार के दिल्ली एडिशन में, वो भी अंगरेजी में छपे इस विज्ञापन का औचित्य समझ में नहीं आया. किसे दिखाने के लिए है ये विज्ञापन. कम से कम पचास हजार का तो होगा ही ये विज्ञापन. और अखबारों में भी छपे होंगे. और भी जगहों से छपे होंगे. मुझे विज्ञापनों के रेट का ठीक से अंदाजा तो नहीं है परन्तु प्रचार के सारे खर्चों को जोडें तो एकाध करोड़ का खर्च तो बैठा ही होगा. इतने पैसों में कितना चावल, दो रूपये के हिसाब से आ जाता ये आप ख़ुद ही जोड़ लें. खैर ये तो एक बात हुई. मजेदार बात ये है कि गरीबों को दो रूपये किलो चावल देने का सपना रेड्डी जी पिछले चार सालों से संजो रहे थे और अब जा कर उनका सपना साकार हुआ. चुनावों से कुछ दिन पहले. क्या टाइमिंग है. सपने भी टाइम देख कर साकार होने लगे हैं. कोई रेड्डी जी से पूछे इन चार सालों में उन्हें किस मजबूरी ने रोका था और प्रदेश के साथ साथ लोकसभा चुनावों से ठीक पहले अचानक ऐसा क्या हो गया कि उनकी सारी मजबूरियां एकदम से ख़त्म हो गयीं. और कोई उनसे ये भी पूछे कि गरीब बाप की बेटी की जवानी की तरह रोज बढ़ती मंहगाई के इस दौर में, जिसके लिए उन्हीं की पार्टी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार जिम्मेदार है, आंध्रा के ग़रीब, फकत चावल ही फांकेंगे या ४०-४५ रूपये किलो वाली दाल या दाल से बनने वाली चीजें भी मिलाएँगे. इतना ही नहीं रेड्डी साहब ने फौरन ही इस दरयादिली की कीमत भी वसूलने की जुगत कर ली. उन्होंने लोगों से इस favour को appreciate भी करने की अपील की है. अब इस apprecition का वोटों से नाता तो सभी जानते हैं. हद है भई . अभी लोगों के पेट में चावल गया भी नहीं है और उन्होंने कीमत वसूलने का काम शुरू कर दिया. इसे कहते हैं इस हाथ ले उस हाथ दे . वरुण राय

रिक्शेवाले का राजनीतिक ज्ञान

आज बड़े दिनों बाद रिक्शे पर बैठने का संयोग हुआ. भाड़ा तय करने के दौरान मंहगाई पर चर्चा हुई और उसके तर्कों से सहमत होकर मैंने उसे उसके मनमाफिक भाड़ा देना स्वीकार कर लिया. मैंने यूँ ही टाइम पास करने के लिए राजनितिक चर्चा शुरू कर दी. प्रदीप साहा,जो उसका नाम था,चूंकि पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का रहने वाला था, इसलिए मैंने केन्द्र सरकार में वामपंथी दलों की भूमिका के बारे में चर्चा शुरू कर दी. चर्चा के दौरान मुझे उसके राजनीतिक ज्ञान पर हैरत हो रही थी. हालांकि वामपंथियों की भूमिका से वह असंतुष्ट था परन्तु भीषण मंहगाई के लिए वह कांग्रेस को ही जिम्मेदार मान रहा था. उसके अनुसार वामपंथी तो मंहगाई से स्वयं असंतुष्ट हैं. मैंने जब पूछा कि अगर वामपंथी सरकार से संतुष्ट नहीं हैं तो समर्थन वापस क्यों नहीं लेते हैं. इसपर जानते हैं उसने क्या कहा- वामपंथी बेवकूफ थोड़े न हैं. सत्तासुख का ये अवसर फ़िर मिले न मिले इसलिए समर्थन देना उनकी मजबूरी है. और हो हल्ला इसलिए मचाते रहते हैं कि बदनामी का सारा ठीकरा कांग्रेस के सर फूटे और वो बेदाग बने रहें. सबसे हैरत हुई मुझे परमाणु करार पर वामपंथियों के विरोध पर उसके विचार जानकर. उसका कहना था कि वामपंथियों का विरोध मात्र दिखावा है. उनका असल मकसद तो सरकार की इस मुद्दे पर बांह मड़ोड़ कर अपना उल्लू सीधा करते रहना है. मुझे अब उसकी बातों में मजा आने लगा था. मैंने जब सरकार के भविष्य के बारे में उसका विचार जानना चाहा तो एक राजनीतिक विशेषज्ञ की भांति उसने कहा कि चुनाव तो अब अपनी नीयत समय पर ही होंगें पर इस गठबंधन का दुबारा सत्ता में आना मुश्किल है. उसकी नजर में बीजेपी सत्ता में आ सकती है परन्तु उसे भी गठबंधन सरकार ही चलानी होगी. हालांकि बीजेपी से भी उसे कोई ख़ास उम्मीद नहीं है. उसका मानना है कि सभी राजनीतिक दल और सभी नेता एक जैसे हैं. मजे की बात है कि जिस गठबंधन के सहारे आजकल की सरकारें चल रही हैं, एक रिक्शे वाले को भी उससे चिढ है. वर्तमान राजनीति की अधिकांश बुराईयों के लिए वह भी गठबंधन की मजबूरियों को ही जिम्मेदार मानता है. आपको हैरत होगी कि प्रदीप साहा मैट्रिक पास भी नहीं है और देश के बारे में इतना सोचता है जितना हमारे नेता शायद ही सोचते होंगे. मैंने इस बाबत उससे पूछा भी. जानते हैं उसने क्या जबाव दिया ? उसने कहा - हमारा देश है साहब. इसके अच्छे बुरे का सोचना तो पड़ेगा . मैं हैरान हूँ कि जिस देश का एक रिक्शा वाला भी इतना जागरूक है उस देश में सड़े हुए नेता चुनकर कैसे आ जाते हैं और उनके हाथ में सत्ता कैसे चली जाती है? काश, हमारे रहनुमा कम से कम उस रिक्शेवाले की तरह सोच पाते.

ज्वालामुखी

ऊपर से शांत कितना
भीतर से
आतुर
एक ज्वालामुखी
फटने को ।
जिंदगी दुविधा में
शांत रहे या
फट जाए
अकुलाकर ।
तुमुल कोलाहल
अन्दर
ऊपर
नीरवता सी छाई
द्वंद भरा यह
जीवन
कब तक?
अंतस्तल बिंधे हुए
वेदना का स्वर
मौन
किसे किसकी
ख़बर
स्वयं में
गम सभी ।
प्राण निस्तेज
भावनाएं शून्य
जिंदा होने का
एहसास दिलाती
सिर्फ़
एक धड़कन।

वरुण राय

Tuesday, April 8, 2008

बीजेपी की पुचकारू राजनीति

सुना है बीजेपी मदन लाल खुराना , उमा भारती और बाबूलाल मरांडी को ,जिन्हें उन्होंने कुछ अरसे पहले लतिया कर भगा दिया था , फ़िर से पुचकार रही है। और पुचकारे भी क्यों नहीं। पुचकारने का टाइम जो आ गया है । लोकसभा चुनाव सिर पर है। प्रधानमंत्री-इन-वेटिंग के वर्षों से संजोये सपने के साकार हो सकने की सम्भावना का अन्तिम अवसर है। इसके लिए जीवनी तक लिख डाली । ये निगोड़ी जीवनी लेखन की कला भी इधर कुछ ज्यादा ही फैशन में है। लेकिन भाई प्रधानमंत्री-इन-वेटिंग के हौसले की दाद देनी होगी। जिनके भी बारे में अपनी किताब में बुरा लिखा, उनसें चुन-चुन कर किताब के लोकार्पण समारोह में बुलाया। खैर, लगता है मैं भटक गया। मैं कह रहा था कि बीजेपी में अभी पुचकारने का दौड़ चल रहा है। यहाँ तक कि मदन लाल खुराना जैसे अव्काश्प्रप्ती के दरवाजे पर खड़े नेताओं को भी पुचकारा जा रहा है। खुराना जी तो खैर 'पुचकृत भी हो गए हैं। केशु भाई पटेल को भी राज्य सभा का चारा दिया गया है। बावजूद इसके कि अभी हाल के गुजरात चुनावों में ही नरेन्द्र मोदी ने उन्हें उनकी औकात बता दी थी। कोई कसर जो नहीं छोड़नी है। मदद न कर पाएं तो कम से कम टांग तो नहीं खीचेंगे। और उमा बहन का तो मुझे लगता है "जोड़े से फ़िर न जुड़े , जुड़े गाँठ परि जाय " वाला हाल है। कब तमक के चल देंगी कोई भरोसा नहीं। एक बात गौर किया है आपने । उमा भरती ,ममता बनर्जी ,मायावती और जयललिता की चौकड़ी में एक समानता है। नहीं, दो समानता है। एक तो ये कि ये सभी महिलाएं हैं और दूसरी कि चारों की चारों बेवफा हैं। किसी एक के साथ इनका गठबंधन टिकता ही नहीं। मैं फ़िर विषयांतर हो गया। खैर, एक बाबूलाल मरांडी है झारखण्ड में जिनको सबसे ज्यादा पुचकारने की जरूरत है बीजेपी को। उनकी घरवापसी बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकती है। झारखण्ड में उनकी कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है। झारखण्ड के नेताओं में तो प्रदेश को बरबाद करने की जैसे होड़ लगी हुई है। ऐसा नहीं है कि बाबूलाल मरांडी एकदम चकाचक हैं। साफ सुथरे , सुधरे हुए। परन्तु झारखण्ड की राजनीतिक टोकरी में वे सबसे कम सादे हुए सेब हैं। देखते हैं प्रधानमंत्री-इन-वेटिंग की इस पुचकारू राजनीति उनके सपनों के साकार होने में कितना सहायक होती है। आमीन ।
वरुण राय

Monday, February 25, 2008

कॉमशिॅयल ब्रेक

शरबतिया कल भूख से मर गई
मीडिया की उसपर नजर गड़ गई
अख़बार वाले आए ,आए टीवी वाले भी
दो दिनों के बाद आये मुख्यमंत्री के साले भी।

परिजनों के इन्टरव्यू लिए गए
मृतिका की तस्वीर
बिकने के लिए तैयार हो गयी
मौत की तहरीर ।

भूख से हुई मौत
कितनों की भूख मिटाएगी
मौत की ख़बर भी
कॉमशिॅयल ब्रेक के साथ दिखायी जायेगी ।

नमस्कार ,आज की टॉप स्टोरी में हम
शरबतिया की भूख से हुई मौत को दिखायेंगे
हत्या,लूट ,बलात्कार वाले आइटम
बाद में दिखाए जायेंगे ।

सात दिनों से भूखी शरबतिया के
निकल नहीं रहे थे प्राण
सूखी छाती से चिपटे बच्चे के चलते
अटकी थी शायद उसकी जान ।

आख़िर ममता पर भूख पड़ी भारी
थम गई आज शरबतिया की साँस
छाती से चिपटे बच्चे ने लेकिन
छोड़ी नही थी दूध की आस ।

खबरें अभी और भी हैं श्रीमान
जाइयेगा नहीं
मौत की ऐसी मार्मिक ख़बर
किसी और चैनल पर पाइयेगा नहीं ।

परन्तु फिलहाल हम एक
छोटा सा ब्रेक लेते हैं
आपको भी आंसू पोछने का
थोड़ा वक्त देते हैं ।

प्राइम टाइम पर
ख़बरों का सिलसिला जारी है
शरबतिया के बाद उसके
मरणासन्न बेटे की बारी है ।

बच्चा भूखा है
कुपोषण का शिकार है
दो-चार दिनों में वह भी
मरने के लिए तैयार है ।


हम उसपर अपनी नजर
जमाये हुए हैं
कुछ और कमाने की
जुगत भिड़ाये हुए हैं ।

बच्चा बच गया तो हमारी किस्मत
ख़बर बिकाऊ नहीं होगी
चौबीस घंटे के चैनल के लिए
टिकाऊ नही होगी ।

क्योंकि ख़बर तो वही है
जो बिकती है
कम से कम चौबीस घंटे तक
जरूर टिकती है ।

अर्थवाद के इस युग में
पैसा पत्रकारिता पर भारी है
लोकतंत्र के चौथे खम्भे की
कॉमशिॅयल ब्रेक लाचारी है ।

Sunday, January 27, 2008

एक और दांडीमाचॅ

सावधान बापू ,
होशियार
निकला है एक बार
फिर से दांडी मार्च ।

तुमने तो खिलाफत की थी
अंग्रेजी हुकूमत की
तोड़ कर कानून नमक का
मान मर्दन किया था
फिरंगियों का ।

इन्हें करनी है किसकी खिलाफत
किसका मानमर्दन करना है
हमारा या तुम्हारा ।

कौन सा कानून बचा है
देश का
नहीं तोड़ा है इन्होंने जिसे
अब क्या तोड़ेंगे
देश को या समाज को ।


तुम्हें तो स्वाधीनता प्राप्त करनी थी
लोगों को एक किया था
दांडी मार्च के बहाने
इन्हें क्या पाना है
सत्ता कुर्सी या पावर ।

सावधान बापू ,
होशियार ।
तुम्हें , तुम्हारी दांडी यात्रा को
तुम्हारी अहिंसा को
तुम्हारे नाम को
बेचा जा रह है
राजनीति के बाजार में ।

पुरानी रवायत है
हमारी राजनीति की ये
हम बेचते हैं तुम्हें
तुम्हारी जैसी अन्य महान आत्माओं को
अपनी सुविधानुसार
और खरीदते हैं बदले में
अपने लिए वोट
ताकि भोग सकें
सत्ता सुख ।

ये जो लोगों का हुजूम
दिख रह है तुम्हें
इस आधुनिक
दांडी मार्च में
ये इंसान नहीं हैं
महज वोट हैं ये
और हैं साथ में चंद
वोटों के सौदागर भी ।

छोटी सी यात्रा थी तुम्हारी
दांडी तक की
लक्ष्य विशाल था
तिरंगा लहराने का
लाल किले पर ।

आधुनिक दांडी की यात्रा
भी छोटी है
पर लक्ष्य तुमसे भी विशाल

काबिज होना है
देश की सत्ता पर
और छोटे क्षत्रपों को
भी मिलाना है
अपने साम्राज्य में
जो भोगने नही देता
इन्हें चैन से सत्ता सुख ।

तुम तो सत्य के पुजारी थे
असत्य के देवता ये
अहिंसा मंत्र था तुम्हारा
हिंसा संबल इनका
तुम्हारा था जो देश प्यारा
स्वार्थ सिद्धि का साधन इनका ।

इसलिए सावधान बापू ।
सावधान इन राजनीतिक प्राणियों से
खुश न हो जाना
तुम कहीं
माला चढ़ायें ये प्रतिमा
पर जब तुम्हारी
समझ लेना है इनका
ये कोई पाप को
ढकने का बहाना ।

Thursday, January 3, 2008

पत्नी प्रताड़ित पति महासंघ

जैसे ही मैंने पत्नी प्रताड़ित पतियों का
अखिल भारतीय महासंघ बनाया
देश के कोने कोने से सदस्यता की खातिर
भुक्तभोगियों का आवेदनपत्र आया ।

वे सदस्यता अनुरोध से ज्यादा
पति प्रताड़ना के पर्चे थे
प्रताड़ना की किस्मों के उसमें
तरह तरह के चर्चे थे ।

अब लीजिये इन साहिबान की
एक शहर के पुलिस कप्तान की
लिखते हैं मेरे डंडे के सामने
ये सारा शहर थर्राता है
अपुन अपने शहर का सबसे बड़ा
गुंडा माना जाता है ।

घर घुसते ही मुझे मेरी नानी
याद आती है
बीबी का रौद्र रुप देखकर
मेरी रूह तक काँप जाती है ।

कोशिश करता हूँ जब कभी
पुलिसिया रौब झाड़ने की
देती है धमकी वो मुझे
बेलन से मारने की ।

और अगर कोशिश पर अपनी
मैं अड़ा रहता हूँ
बीबी का बेलन खा कर
बिस्तरे पर पड़ा रहता हूँ ।

दूसरे साहिबान लिखते हैं
सरकारी स्कूल का शिक्षक हूँ
वर्षों से वेतन का प्रतीक्षक हूँ
यदा कदा जब कभी स्कूल जाता हूँ
बच्चों पर जोर आजमाता हूँ।

उठाता बिठाता हूँ कान पकड़वाता हूँ
अक्सर मैं उन्हें मुर्गा बनाता हूँ
घर पर मेरी प्राणप्रिये
मुझ पर ही जोर आजमाती है
उठाती बिठाती है कान पकड़वाती है
जब जी में आता है मुर्गा बनाती है ।

बात यहीं तक रहती
तो गनीमत समझता
इसे भी मैं खुदा का ही
नेमत समझता
परन्तु हर सुबह कार्यक्रम
दुहराया जाता है
मुर्गा बना कर बाकायदा
कुकरूकूँ बुलवाया जाता है ।


अब सुनिए न्याय के
इस मठाधीश की
देश के एक होनहार
न्यायधीश की
लिखते हैं लोगों को
कटघरे में खड़ा करता हूँ
घर में खुद को ही
कटघरे में खड़ा पाता हूँ
हर बात पर बीबी ही
फैसला सुनाती है
मैं बिचारा अपील भी
नहीं कर पाता हूँ
क्या करूं साहब जान
पर बन आयी है
कातिल ही मुहासिब है
कातिल ही सिपाही है
शारीरिक नहीं मानसिक
प्रताड़ना का शिकार हूँ
इसलिए आपके संघ की
सदस्यता का तलबगार हूँ ।

हैरत में हूँ देखकर
खतों के इस अम्बार को
हंस कर जो टाल देते थे
पहले बीबी की मार को
संघे शक्ति कलियुगे का
होने लगा है भरोसा उन्हें
बीबी ने किसकिस बात पर नहीं
अबतक है कोसा उन्हें
तैयार हैं बीबी के विरुद्ध
होने को गोलबंद वो
मकसद में कामयाबी की
कोशिश करेंगे हरचंद वो
मैं भी हो रह था कुप्पा
करतब पर अपने फूलकर
बीबी ने जो अबतक दिए थे
उन सारे दर्दों को भूलकर ।

तभी कानों में मेरे
कोई बिजली सी कड़की
खडी थी सामने लाजो मेरी
आग सी भड़की-भड़की
न संघ न शक्ति बस
याद रहा कलियुग ही कलियुग
बीबी से पिटने का यारों
है इक्कीसवीं सदी का ये युग ।

पत्नी प्रताड़ित सभी पतियों से
करता हूँ क्षमा की विनती
मेरी भी होती है भाई
प्रताड़ित प्राणियों में ही गिनती
कर सका न मैं अपना भला
आपका भला क्या कर पाउँगा
बीबी के खिलाफ गया अगर मैं
तो असमय शहीद हो जाऊंगा ।